विश्वराज अधिकारी,सर्लाही,२५ गते पुस ।

‘बहुत लोगके प्राण हम लेलेली’, काका कहइतगेल, ‘गावंके धनिकसब मिलके हमरा बहुत दुस्ख देलख। हमर शोषण कएलक। हमरा उपर अनेक अन्याय कएलक। उहे धनिकसबसे बदला लेबेला हम डाँकू बनगेली। गाउँके दसौ धनीक मार देली। मुदा हम गरिबके कहियो दुस्ख नदेली। ओकनीके घरमा डकैती कहियो नकइली।’
‘बहुत धनिकसबके धन लुटके त तु खुब धनिक होगेला। सोना चानी खुब बिटोरला, न, काकारु’, हम उत्सुकताबस पुछली।
‘डकैती कके धनसे धनिक भेली मुदा ‘‘।।’ समुचा बात काका नकहे सकल।
‘मुदा‘।, एकर मतलब कि हएरु’, हम काका से पुछली।
‘हमर चारु बेटा पढाइ लिखाइ छोडके डाँकु होगेल। गरिबोके घरमे डकैती करेलागल। हम गरिबके बचाबेला डाँकु भेली। मुदा हमर बेटा सब गरिबके लुटेला डाँकू भेगेल’, एतना कहके काका हमराओरी भरल आँखसे ताके लालग।
‘काका, तु डाँकू न बनल रहता त तोहर बेटासब डाँकू नबनतियौ, बुझला। अपन सन्तानके निमन रस्तामे चलाबेला खुद निमन रस्तामे चलेके परइछइ’, कहेके मन रहे, मुदा नकहली।
विश्वराज अधिकारी