कविता
विगन रौनियार
दुर्गा भगवती गा.पा.3 मत्सरी
भुलल बिसरल गाओमें
उषा कालिन याद
बचपन निंदसे जागल
चिरइके कलरब साथ।
गाओ कहमा गेलओ
माय बापके प्यार
उठा उठा बबुवा हमर
होगेलओ विहान।
घुर पाकल आलु अलुवा
मर बथुवाके स्वाद
आलु के चोखा चटनी
बसिया भात खास
भुलल बिसरल मन ताजा
गगनमे खिलल फूल
सुरजके लालिमा लाल
उतगेल भोरे भोर।
पतझडमें पत्ता बन के
उरे लागल मन मोर
गाओके अंगनामें
आँसु न थमलक थोर।
सहरके धुँवा धुकुरमें
उलझल हमर याद
गाओके पिपर पाकरके
कहमा गेलक छाह।
ढेकीके कुटल छाँटल
जाताके दरल दाल
मरुवाके रोटी मनगर
चिन्ना मिठगर भात
टाली पयना गुलेली
साथी सबके प्रेम
भुलल बिसरल सब साथी
चल गेल कोन देश।
सहरके हल्ला गुल्ला
सज्जन भेल तंग
सहरमें सुकून न मिलल
लुट पाटके तंत्र।
सुंदर शांत मन भावन
हमर बज्जिका बाग
वसंत बेयार लेयलक
बचपनके सुवास ।

