बज्जिकाञ्चल,१७ गते माघ ।

लडकारीमे जब रामदयाल आकासपर चिलगडी देखे त देखते रह जाए। सोंचे( कौनो दिन हमहुँ एहिना चिलगडीमे चढम। अकासमे घुमम।
गैबारीमे ओलार से जंगल ओरि निकलल रामदयाल चिलगडीके कल्पनाके दुनियामे हेरा जाए। कएबेर ओकर गाइसब लोगके धानके बिया खागेल। मुदा रामदयालके पत्तो नचलल। एतना भेलापर रामदयाल चिलगडी देखनाइ नछोडलक।
मुदा अखुनी इ बुढारीमे रामदयाल चलिगडी देखके बौखला जाइअ। ओकर चले त ऊ जमिनसे झटहा मारके चिलगडी जमिनमे गिरादेबे।
राजेशके मुहसे इ कहानी सुनला पर हम आश्चर्य चकित होके ओकरा से पुछली, ‘एतिघडी चलिगडी देखेके रामदयाल काहे बौखलाजाईअरु’
रामदयालके नाती कतार गेलरहे कमाए। मुदा लास बनके लौटल, नेपाल। रामदयाल खुद अपन आँखसे अपन नातीके लास एगो चिलगडीसे निकलइत देखले रहे, काठमाडुके एयरपोर्टमे। एतना कहलाके बादमे राजेशके आँखसे लोर टपकगेल। हमरो आँखसे लोर टपक गेल।
—विश्वराज अधिकारी