इन्द्रजीत सहनी,रौतहट,१६ गते पुस ।
नेपालके संविधान २०७२ आसिन ३ के जब जारी भेल तब ऊ केवल एगो कानुनी किताब नरहे, बल्कि देशके समाज, संस्कृति, भाषा आ पहिचानके पूरा तरह बदल देबेके एगो बडका सपना रहलक । ऊ सपनाके सबसे उज्ज्वल हिस्सा रहल, सभी भाषाके बराबरी आ हर जात–जनजातिके पहिचानसहितके सम्मान । संविधानके धारा ६ मे साफ–साफ लिख देल गेल कि नेपालमे बोले जाएवाला सभी मातृभाषा अब “राष्ट्रभाषा” कहल जाई आ ओकरा पूरा गौरव मिली । सय–सय बरिससे दबल–कुचलल भाषाके पहिल बेर संविधानमे खुला आ सम्मानजनक जगह देलगेल, जे मातृभाषाके एगो ऐतिहासिक जीत रहल । दश बरिस बीत गेलापर भी ऊ सपना पूरा तरह साकार नहोएसकल । कागजमे जेतना सुन्दर लिखल हए, धरतीपर ओतना नदेखाइ देइता । कुछ प्रदेश साहसिक कदम उठयले हए, बाकी प्रदेशमे सरकारी कामकाजमे मातृभाषाके रास्ता अबहियो लम्बा, कठिन आ काँटेदार लागइत हए ।
संविधानके धारा ७ के उपधारा २ मे साफ कहल गेल हए कि हर प्रदेश अपन प्रदेशके बहुसंख्यक लोग जे भाषा बोलइत हए, ओकरा एक वा एकसे बेसीके कानुन बनाके, सरकारी कामकाजके भाषा बनासकइत हए । मतलब राज्य आ जनताके बीचके बातचीत, दस्तावेज, सूचना, निवेदन आ जबाब अपन मातृभाषामे होसकइत हए । ई संघीयताके केवल कागजमे न, जिनगीमे भी लागू करेला संविधान फाटक खोल देले हए । धारा ७ के उपधारा ३ मे भाषा आयोगके सिफारिसके आधारमे निर्णय लेबेके व्यवस्था हए आ धारा ५१(ग)(७) मे राज्यके बहुभाषिक नीति स्पष्ट जिम्मेवारी देलगेल हए । कुल मिलाके संविधान कहइत हए कि देश जनताके भाषामे जनतासे बोले, न कि जनताके जबरदस्ति राज्य भाषा सिखावे ।
ई संवैधानिक वचनके जमिनी रूप देबेके लेल भाषा आयोगके सबसे बडका जिम्मा देल गेल । आयोग वैरागी काइँला, डा.जगमान गुरुङ, प्रा. योगेन्द्रप्रसाद यादव, प्रा. चूडामणि बन्धु, प्रा. हृदयरत्न बज्राचार्य आ प्रा. माधवप्रसाद पोखरेल जइसन बडका विद्वानके सलाह लेके एगारगो वैज्ञानिक मापदण्ड तयार कएलक । जनसंख्या, लिपि विकास, स्कूलमे पढ़ाइके स्थिति, भौगोलिक घनत्व, भाषाके जीवन्तता, सञ्चारमाध्यममे प्रयोग, कम्प्यूटर–मोबाइलमे फन्ट–कीबोर्डके सुविधा जइसन कडा मापदण्ड राखल गेल । इहे आधारपर २०७८ भादो २१ के आयोग नेपाल सरकारके एगो ऐतिहासिक प्रतिवेदन बुझएलक आ १३१ गो मातृभाषामेसे एगारगो भाषाके अलग–अलग प्रदेशमे सरकारी कामकाजके भाषा बनाबेके सिफारिस कएलक । कोशी प्रदेशमे मैथिली आ लिम्बू, मधेशमे मैथिली, भोजपुरी आ बज्जिका, बाग्मतीमे तामाङ आ नेवार, गण्डकीमे मगर आ गुरुङ, लुम्बिनीमे थारु आ अवधी, कर्णालीमे मगर आ सुदूरपश्चिममे डोटेली आ थारुके सिफारिस कएलगेल । ई सिफारिस नेपालके भाषिक इतिहासके सबसे बडका कदम रहे ।
बाग्मती प्रदेश ई मामिलामे सबले अगाडि हए । “प्रदेश सरकारी कामकाजके भाषा सम्बन्धमे व्यवस्थाके लेल बनल ऐन, २०८०” २०८० कात्तिक २३ मे राजपत्रमे प्रकाशित भेल आ २०८१ वैशाख २४ से पूर्ण रूपमे लागू भी होगेल हए । जनगणना २०७८ के हिसाब कितावमे बाग्मतीमे १९.८८ प्रतिशत तामाङ आ १५.५७ प्रतिशत नेवार समुदाय हए । अपने कौनो सरकारी दफ्तर, अस्पताल वा नगरपालिकामे जाइछी त नेपाली आ अंग्रेजीके जौरे तामाङ आ नेपालभाषामे साइनबोर्ड, सूचना–पाटी, फाराम आ दस्तावेज देखेके मिली । ई केवल दिखावा नहए, ई भाषिक पहिचानके सच्चा सम्मान आ कार्यान्वयनके जिन्दा उदाहरण हए ।
गण्डकी प्रदेश भी पिछे नहए । मगर १९.७९ प्रतिशत आ गुरुङ ११.३१ प्रतिशतके संख्याके आधार बनाके २०८२ साओन १९ मे “प्रदेश सरकारी कामकाजके भाषा सम्बन्धमे व्यवस्थाके लेल बनल ऐन राजपत्रमे प्रकाशित भेगेल हए । १८० दिन पहुँचते ही आपसे आप लागू होजाई । गण्डकीके कानुन बहुतके प्रगतिशील हए काहेकि सेवाग्राही अपन मातृभाषामे निवेदन देसकैत हए आ जबाब भी उहे भाषामे पासकइत हए । नागरिक वडापत्र, सूचना–पाटी आ सार्वजनिक दस्तावेज मगर आ गुरुङमे अनिवार्य राखल जाई । ई राज्य आ जनताके बीच विश्वास बनाबेके आ संघीयता मजगुत बनाबेके वहुत जरुरी कदम हए ।
मधेश प्रदेशके हालत सबसे निराशाजनक हए । जहाँ देशके सबसे जादा भाषिक विविधता हए, ओतने सबसे बेसी अटकल भी हए । जनगणना २०७८ के हिसाबसे मधेशमे मैथिली २२ लाख ९० हजार ८९५, बज्जिका ११ लाख ३८ हजार १७९, भोजपुरी ११ लाख ३७ हजार ६२५ बोलेवाला हए । हिन्दी केवल १४ हजार २३२ जने आ अंग्रेजी केवल ४५ जनेके मातृभाषा देखलगेल हए लेकिन विधेयकमे हिन्दी–इंग्लिश घुसावेके कोशिश जे भेल हए, भाषा आयोगके सिफारिसके खिलाफ हए । बज्जिका, मैथिली, भोजपुरी बोलेवाला लाखोंमे हए, फिर भी ऊलोगके भाषा सरकारी दफ्तरमे अवहियो पराई जइसन हए । लुम्बिनी, कर्णाली आ सुदूरपश्चिममे सेहो प्रक्रिया लगभग ठप जइसन हए ।
कार्यान्वयनमे जेतना समस्या हए, ऊ कम नहए । पहिलका आ सबसे बडका समस्या दक्ष जनशक्तिके कमी हए । अनुवादक, दुभाषिया, सम्पादक, प्रशिक्षित कर्मचारीके संख्या बहुत कम हए । मातृभाषामे पढावेवाला शिक्षकसे १०–१२ हजारमे काम करावल जाइत हए, गुणस्तर कहाँसे आई । दुसर, पैसा आ संशाधनके बडका कमी हए । बहुभाषिक छपाइ, सफ्टवेयर, डिजिटल फन्ट, तालिम सब महङ हए आ बजेटमे प्राथमिकता अभितक नमिलइत हए । तेसर, लिपि आ बोलिपिके झगडा हए । केकर भाषाके संख्या जादा आ लिपिमे केकरा आधिकारिक मानल जाए, ई सवालपर समुदायमे टकराव होइत रहले लेकिन सरकारी दस्तावेज जे कही उहे मानेके परी सबलोगके । चौथा, प्रविधिके अभाव हए । देवनागरीबाहेक रंजना, तिरहुता, लिम्बू, तामाङ लिपिके लेल पूरा युनिकोड फन्ट, किबोर्ड आ सफ्टवेयर नहए आ सबसे बडका समस्या मातृभाषा विकासके लेल नेतासभमे इच्छाशक्तिके कमी हए । भाषाके केवल भोट बैंक समझल गेलासे असली नीतिके ढिलाइ होरहल हए ।
ई सब समस्याके समाधान पाल्ही–पाल्हीसे सम्भव हए । पहिलका पाल्हीमे गाँओपालिका, नगरपालिका, स्वास्थ्य चौकी, विद्यालयमे मातृभाषा लागू करेके परी । दोसर पाल्हीमे विश्वविद्यालयमे अनुवाद, भाषा प्रौद्योगिकी, फन्ट डिजाइन आ दुभाषियाके कोर्स खोलके पढाइ करेक परी । तेसर बेरमे भाषाविद आ आइटी विशेषज्ञ मिलके मानक शब्दकोश, लिपि आ डिजिटल टूल बनाएल जाए । चौथा बेरमे प्रदेश आ स्थानीय सरकार बजेट आ साफ कार्ययोजना बनाके अगारी बढेके परी ।
अंतमे, बाग्मती आ गण्डकी जे साहसिक कदम उठएले हए, ऊ नेपालके भाषिक लोकतन्त्रके लेल एगो आशाके किरण हए । जब राज्य जनताके भाषामे जनतासे बोली, समझी, कागज देबे लागी आ जवाब लेबे लागी, तहिया मात्रे संवैधानिक सपना पूरा होई । सरकारी कामकाजमे मातृभाषाके प्रयोग खाली सुविधा न, ई सामाजिक न्याय, समावेशिता, समानता आ राष्ट्रके एकताके सबसे मजबूत कडी हए । चाहे बज्जिका बोलू, मैथिली बोलू, थारु बोलू चाहे तामाङ बोलू, हर नेपाली जब राज्यके कानमे अपन जुबान सुनासकी, तहिया नेपाल साँचोमे समावेशी आ समतामूलक देश बनजाई ।

