कविता

मेहनत के बीज जब धरती में बोआ जाला,
तब ही सपनवा साँच बनके सोना झलमलाला।
पसीना के धार जवन माथा से टपके,
उहे भाग के ताला खुदे आपे खपके।

जो रोजे उठ के काम में जी जान लगावेला,
उहे कल के सूरज आपन नाम चमकावेला।
काँटा भर रास्ता में डर ना घुसावे,
मेहनत वाला आदमी मंजिल पावे।

आज के दुख कल के सुख बन जाला,
धीरज रखे वाला कबहूँ ना हाराला।
मेहनत के फल मीठ, देर से सही,
साँच कहतिया दुनिया—मेहनत कभी ना जाई।