मंसिर,१३ गते ।

 


गाँओघरमे भोज खाएके प्रकृति अभी भी ओहने रहल हए । गाँओके लोगमे अभी भी भोजके मामलामे जातप्रथा बहुत कसके रहल हए । कौनो भी शुभ आ अशुभ काममे जातके भोज खिआबेके आ खाएके चलन आज भी रहल हए । परम्परासे ही जातके लोग भोज खाएके समूह बनाके रहलहए जेकरा गमाह कहेके चलन हए ।

 

गाँओघरमे सादी आ कुलदेओताके पूजा तथा मरणहरनमे गमाहके लोग बैठके केहन भोज खाएके आ केतना लोगके भोज खिआबेके कहके एक हिसाबसे पंचइती ही होखेके चलन रहल हए । गाँओके जातभाइके निर्णय मानेके सभीके एक हिसाबसे बाध्यता रहल हए । निर्णय करेके समय जग करेबालाके आर्थिक हैसियतके देखनाइ बहुत जरुरी मानल जाइअ । औकाद देखके ही भोज खाएके चलन हए । 

गाँओघरमे जग कहेके मतलब सादीबिआह, कुलदेओताके पूजा आ मरणहरन मानलजाइअ । अइसही अठजाम, लखराँओ आ सत्यनारायण भगवानके पूजा भी गमाहके भोज माङेके आ खिआबेके चलन रहल हए । 

भोज करेके निर्णय होएलाके बाद पहिले त भोजके सभी काम गमाहके ही करेके परे मानजनके निर्देशनमे मगर आजकाल प्रथा बदलरहल हए । भोज करेके आ सभी व्यवस्थापन करेके काम अब जगीके ही रहगेल हए मगर भोज खाए–खिआबेके समय सभीलोग सहयोग करते आरहल हए । 

पाँतीमे बइठके जातभाइके भोज खिआबेके पहिले आजो भी मठके साधुके आ गाँओके ब्राह्मणके भोजन कराबेके चलन रहल हए । साधब्राह्मणके भोजन करएलाके बाद जातके पलहा आबले । जातके साथ परमिन भी बैठके भोज खासकइअ मगर श्राद्धके भोजमे कमसेकम एक बिजो जातके खएलापर मात्र दोसर बिजोसे परमिनके खाएके परम्परा कायम रहल हए । जातके नाओपर भोज खाएके आ जातके भोज खिआबेके गाँओघरमे आज भी जगीके लेल एगो गर्वके विषय बनल हए । 

गाँओके लोग पाँतमे बैठके भोज खाएके दृश्य अपनेआपमे निराला रहल हए । बढइत सहरी संस्कृतिके प्रभाव खानपानपर जरुर परल हए मगर खिआबेके आ खाएके प्रकृति करिब ओहने हए । अभी भी लोग पाँतमे साधारण बोरा चाहे खरहीपर बैठले चाहे अपना चपलपर बैठके ही खाए लागले । पाँतमे भोजके कुछो चलाबेबाला जुत्ताचपल कुछो पहिरके नचलाबेके चलन हए । 

भोज खाएके चलन आ खिआबेके चलनसे सामाजिक सम्वादमे कमी नआबेके आ एकदोसराके साथ देबेके पारस्परिक सामाजिक विश्वासमे निरन्तर वृद्धि होइरहेके बुद्धिजीवीलोगके कहनाम हए । ग्रामीण समाजके जनजीवनमे जातभातके जेतना महत्व रहल हए ओतने महत्व भोजभातके भी रहल हए । औकातसे बेसी लमहर भोजभात मङनाइके सामाजिक विकृति मानल जासकइअ मगर सामाजिक एकता, सदभाव आ परम्पराके बचाबेके दृष्टिकोणसे जे भोजभातके परम्परा रहल हए, ओकरा निमन मानेके कुछ बुद्धिजीवीके कहनाम हए ।